नशे में जब होता हूँ॥
नशा से चूक जाता हूँ...
नशा चढ़ती मुझपर है॥
मै उससे रूठ जाता हूँ॥
कोशिश तो करता हूँ उठने की॥
पैर यूं ही डगमगाते है॥
मिलते है रास्ते में जो मुझसे॥
मुझे धक्के लगाते है...
कुछ तो हंसते मुझपे है॥
कुछ बेबात सुनाते है॥
मै सुनता अपनी मस्ती में॥
बेसुरा जो गीत गाता हूँ॥
संभल के चलना सीखा है॥
रोकती राह मेरी ओ॥
उलझने पैदा करती है॥
क्रोध का समुन्दर जो॥
उन्ही से पिटते पिटाते ॥
मै अपने को खो देता हूँ...
ढूढता उस नशीली को॥
नशा को लील जाता हूँ...
गमो की होती बारिश जब ॥
उसी में भीग जाता हूँ॥
उतरती जब नशा मुझसे॥
मै खोजता बुझती ताकत को॥
घूमता हूँ दर दर भटकता॥
मांगता सस्ती आफत को॥
जो गिराती मुझको खायी में॥
दुबाती गंदे पानी में॥
लगा देती कीचड़ कलंक॥
अब दम नहीं सच्ची जवानी में॥
उसी के लत में जीना सीखा॥
उसी का प्यार गाता हूँ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें