गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015
बुधवार, 19 फ़रवरी 2014
सरस्वती का नाम नंदा क्यों पड़ा ?
बहुत पहले की बात है पृथ्वी पर एक प्रभंजन नाम के महाबली राजा थे। एक दिन वह वन में मृगो का शिकार कर रहे थे। उन्होंने देख एक झाड़ी के पीछे एक हिरणी खड़ी है। प्रभंजन ने उस हिरणी को निशाना बनाया और हिरणी गिर पड़ी। और सामने धनुष वाण लिए राजा से बोली हे पापी मूर्ख तूने यह क्या कर दिया तूने घोर पाप किया है। मै यहाँ सिर नीचे किये हुए खड़ी थी और शांत मन से अपने बच्चो को दूध पिला रही तूने अपना मुझे निशाना बनाया ,, तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। इस लिए तू जा कच्चा मांस खाने वाला पशु बने। तू इस वन का व्याघ बनेगा। मृगी का शाप सुन के राजा के होश उड़ गए। कल्याणी मै नहीं जानता था कि तूने अपने बच्चो को दूध पिला रही है। अनजान में मैंने तुम्हारा वध किया। अतः मुझपर प्रसन्न हो मै ब्याघ्र योनि को त्याग कर पुनः मनुष्य शारीर को कब प्राप्त करूगा। आप ने जो श्राप दिए है उसकी अवधि भी तो बता दीजिय" महराज के सौ साल बाद यहाँ पर नंदा नाम की एक गाय आएगी उसके साथ तुम्हारा वार्तालाप सुन क्र तुम्हारे शाप का अंत होगा। मृगी के कहने के अनुसार राजा प्रभंजन व्याघ्र हो गया उस ब्याघ्र की आकृति बड़ी गंभीर और भयानक थी। वह जीव जंतु मानव पशु सब की मांस खा कर जीवन यापन करने लगा। वह अपनी निंदा करता और कहता अब मै पुनः मनुष्य का शारीर पाऊगा। अब ऐसा पापनहि करूगा जब उसको सौ साल बीत गए तब एक दिन वहा पर गौवों का झुण्ड आया वहा पर हरी भरी घास और जल की सुविधा उपलब्ध थी। उस झुण्ड में वहाँ पर सर्बगुण संपन्न एक गाय थी। जिसका नाम नंदा था। एक दिन वह अपने झुण्ड से बिछुड़ गयी बाघ उसे देखते ही दौड़ा और कहा आ जा आज विधाता ने तुझे मांस नियुक्त किया है बाघ की आवाज सुन गाय अपने बच्चो को याद करने लगी। और रुदन करने लगी उस गाय को रुदन करते देख ब्याघ्र ने बोला " ओ गाय संसार में सब लोग अपने कर्मो का फल भोगते है तू मेरे समीप अपने आप आयी इस लिय आज तुम्हारी मृत्यु ही नियति है। अच्छा यह तो बता तू रोयी किस लिए। ब्याघ्र का प्रश्न सुन कर नंदा गाय ने कहा " ब्याघ्र तुम्हे नमस्कार मेरा अपराध क्षमा करे। मै जानती हूँ तुम्हारे पास आये प्राणी की रक्षा असम्भव है। इस लिय मई अपने मै अपेन जीवन के लिय शोक नहीं करती क्यों कि मृत्यु एक दिन अस=अवश्य आएगी किन्तु मृगराज अभी नयी अवश्था में है। मै एक बछड़े को जन्म दिया है। पहली बियान का बच्चा होने के कारण वह हमको प्रिय है। मेरा बच्चा अभी केवल दूध पीता है। इस समय गोष्ठ में बंधा है। और भूख से बिकृत हो कर मेरी राह देख रहा होगा। उसी के लिए मुझे शोक हो रहा है पुत्र मोह से बशीभूत हो रही हूँ और उसे दूध पिलाना चाहती हूँ। आप हमें थोड़ी देर के लिए जाने दीजिये बछड़े को दूध पिलाने के बाद उसका चाटूँगी उसको होतोहित की जानकारी के लिय अपने कुछ उपदेश दूगी फिर मै आप के पास आ जाऊगी। बाघ बोले तुझे अब पुत्र से क्या काम है पहले पहले हमें बच्चा दिया समस्त साथियो से विदा लेते वापस आ जाऊगी मै शपथ खा कर कहती हूँ। बाघ को विशवास हो गया। लेकिन कुछ लोग तुम्हारे से यह कहेगे स्त्री के साथ हास परिहास में विवाह में गौ को संकट में बचाने के लिए जो शपथ ली जाती है। उसकी उपेक्षा पाप नहीं लगता किन्तु तुम उन बातो पर विशवास नहीं करना इसी वार्तालाप से बाघ को मनुष्य शारीर प्राप्त हुआ और मनुष्य शारीर को पापसे मुक्ति और पवित्र करने के लिए सरस्वती को प्रकट होना पड़ा था। सरस्वती का एक नाम नंदा भी है ///
रविवार, 18 दिसंबर 2011
आलू गाज़र प्यार भइल बा..
आलू गाजर प्यार भइल बा॥
चुम्मा दिये निनारे मा॥
एक का छोडे एक का पकडे।
मजा करय खलिहाने मा॥
भैआ खड़े दुआरे ताकय॥
मैया खड़ी पिछवाड़े बा॥
लाज शरम सब छूट गइल बा॥
शीटी बजे ओसारे मा॥
न केहू कय दर अब रहली॥
न केहू कय मानय बात॥
ऐसा कलयुग आय गईल बा॥
रस चूसे तहखाने मा॥
अगर केहू जब करय शिकायत॥
तब देखा गुर्राय...
जैसे शेर गरजे गंजल मा॥
वैसे खडा देखाय...
इनसे अबतो राम बचावे...
रास रचवाय सिरहाने मा॥
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
आलू गाजर प्यार भइल बा॥
चुम्मा दिये निनारे मा॥
(आधी रात की उठ उठ भागय॥
छुपा मिलय तहखाने मा॥)
भैया खडा दुआरे ताके॥
मैया कड़ी पिछवाड़े बा॥
लाज शर्म सब छूट गयी बा॥
सीटी बजे ओसारे मा॥
चलत इशारा हाथ से करिहय॥
मौक़ा मिळत पकादिहय हाथ॥
न केहू कय डर अब रहिगे॥
न केहू कय माने बात॥
ऐसा कलयुग आय गइल बा॥
रस चूसे मयखाने मा॥
अगर केहू जब कराय शिकायत ॥
तब देखा गुर्राय ॥
जैसे शेर जंगल मा गरजै॥
वैसे खडा देखाय...
इनसे अबतो राम बचावय॥
रास राचावय सिरहाने मा..
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011
गुरुवार, 15 दिसंबर 2011
जाना है मैंने भी
क्यों किस्मत का रोना रोते हो॥ जो राहो में कंकण पत्थर है॥
संघर्षशील जीवन को झेलो॥ माया का यही समंदर है॥
अर्थहीन जब बात करोगे॥ क्या अर्थ शाष्त्री बन जाओगे॥
बिन लय सुर के आलाप भरोगे॥ क्या सच्चे गायक बन जाओगे॥
इस धरती कर जीवन जीने का ॥ कर्म ही उन्नति का मंतर है॥
बाजू में ताकत रहती है॥ समय सत्य का खंजर है॥
बचकानी बात कर कर के॥ क्या जीवन सफल बना पाओगे॥
(जाना है मैंने भी। माना है मैंने भी॥
वक्त की आवाज को .पहचाना है मैंने भी॥
जालिम है दुनिया जालिम जमाना॥
जालिम की आवाज को ..अंदाजा है मैंने भी )
नशे में जब होता हूँ॥
नशा से चूक जाता हूँ...
नशा चढ़ती मुझपर है॥
मै उससे रूठ जाता हूँ॥
कोशिश तो करता हूँ उठने की॥
पैर यूं ही डगमगाते है॥
मिलते है रास्ते में जो मुझसे॥
मुझे धक्के लगाते है...
कुछ तो हंसते मुझपे है॥
कुछ बेबात सुनाते है॥
मै सुनता अपनी मस्ती में॥
बेसुरा जो गीत गाता हूँ॥
संभल के चलना सीखा है॥
रोकती राह मेरी ओ॥
उलझने पैदा करती है॥
क्रोध का समुन्दर जो॥
उन्ही से पिटते पिटाते ॥
मै अपने को खो देता हूँ...
ढूढता उस नशीली को॥
नशा को लील जाता हूँ...
गमो की होती बारिश जब ॥
उसी में भीग जाता हूँ॥
उतरती जब नशा मुझसे॥
मै खोजता बुझती ताकत को॥
घूमता हूँ दर दर भटकता॥
मांगता सस्ती आफत को॥
जो गिराती मुझको खायी में॥
दुबाती गंदे पानी में॥
लगा देती कीचड़ कलंक॥
अब दम नहीं सच्ची जवानी में॥
उसी के लत में जीना सीखा॥
उसी का प्यार गाता हूँ...

