मंगलवार, 29 सितंबर 2009


हम मानवता के दीप है


जो करते प्रकाश


सच कैनी पकड़ कर


चले जाते उस पार


आगे कदम बढ़ता रहे


मौसम भी मुस्कात


बसी बुराई दूर है


आवत लागे लाज... त्याग दिया हूँमन से काले धंधे

रविवार, 13 सितंबर 2009

दिल से धुँआ निकल गवा॥

दिल से धुँआ निकल गवा॥
नकेल खुल गयी॥
रोहित को छोड़ पम्मी॥
दूजे को मिल गयी॥
रोहित बेचारा टूट गवा॥
दारू का जाम लेता॥
बिस्तर पर पडा हरदम॥
पम्मी का नाम लेता॥
नफरत करय ज़माना॥
बिरावय लाग तरैया॥
पूचय प्रश्न टोक के ॥
ऊपर वाली जोधैया॥
रस्तय माँ नैया डूबी॥
ऊ रास्ता भटक गयी॥
रोहित को छोड़ पम्मी॥
दूजे को मिल गयी॥

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

घरना

रूदन करे मन की अभिलाषा


सूख गयी हो प्रेम पिपासा


मन कुंठा हो रूदन करे


बीते कल का प्रेषण करे


तब ध्यान भंग हो जाता है


बीता पल रुलाता है


गुरुवार, 10 सितंबर 2009

हर्ष उल्लास से भरा है जीवन॥

हर्ष उल्लास से भरा है जीवन॥
पर भय भी यहाँ समाई है॥
आतंक की गठरी कब खुल जाए॥
किसकी मौत कब आयी है॥
ब्लू लाइन बस की क्या लीला।
चलत सड़क पर देती मार॥
पता नही कब बम फट जाए॥
गिर जायेगी खड़ी दिवार॥
दुराचारी का दिल ठंडा है॥
महामारी चादर बिछाई है॥

सोमवार, 7 सितंबर 2009

लिख दो दो शव्दप्रेम के ..पंख लगा दो..प्रेमी को....

उड़ जायेगे..इस धरा से..ले के एक नवेली को

रविवार, 6 सितंबर 2009

जब विष्णु जी को अश्व बनना पड़ा

एक बार श्रीविष्णु जी वैकुंठलोक में श्री लक्ष्मी जी के साथ विराजमान थे। उसी समय रेवंत अश्व पर सवार होकर आया। अश्व का नाम उच्च श्रवा था। लक्ष्मी जी बड़ी गंभीरता से उस मनोरम अश्व को निहारने लगीं। श्रीहरि विष्णु ने जब लक्ष्मी जी को इस मुद्रा में देखा, तो उनका ध्यान अश्व से हटाने का प्रयत्न करने लगे, लेकिन सफल न हो पाए।
विष्णु जी ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध में आ गए। खीझकर उन्होंने लक्ष्मी जी को श्राप दे दिया- ‘तुम इस अश्व के सौंदर्य में इतनी खोई हुई हो कि मेरे द्वारा बार-बार झकझोरने पर भी तुम्हारा ध्यान नहीं टूटा, तुम अश्वी हो जाओ।’
लक्ष्मी जी का ध्यान भंग हुआ, तो उन्होंने श्रीहरि द्वारा दिए श्राप का पता चला। कहने लगीं- ‘मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह पाऊंगी। आप मुझे क्षमा करें और अपना श्राप वापस लें।’ विष्णु जी बोले- ‘प्राणप्रिय! श्राप तो पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता। हां, तुम्हारे अश्वी रूप में पुत्र प्राप्ति के बाद तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिल सकती है।’
श्रीविष्णु के श्राप से अश्वी बनी हुई लक्ष्मी जी यमुना और तमसा नदी के संगम पर भगवान शंकर की तपस्या करने लगीं। लक्ष्मी जी के तप से प्रसन्न होकर शंकर जी पार्वती के संग संगम पर अश्वी के पास आए। उन्होंने लक्ष्मी जी से इस रूप में तपस्या का कारण पूछा। लक्ष्मी जी ने उन्हें सारी गाथा कह डाली और प्रार्थना करने लगीं कि आप मुझे इस श्राप से मुक्त होने में सहायता करें।
भगवान शंकर ने सारी बात सुनकर कहा- ‘देवी! मैं विष्णु जी को समझाऊंगा कि वह अश्व का रूप लेकर आपके संग रमण करें अपने जैसा ही पुत्र उत्पन्न करें। कहकर भगवान शंकर और माता पार्वती अपने लोक लौट गए। अश्वी रूपी लक्ष्मी पुन: तपस्या में लीन हो गईं।
कैलाश पर्वत पर पहुंच कर भगवान शंकर विचार करने लगे कि कैसे विष्णु जी को अश्व बनाकर लक्ष्मी रूपी अश्वी के पास भेजा जाए। आख़िरकार उन्होंने अपने एक गण-चित्ररूप को दूत बनाकर विष्णु जी के पास भेजा। चित्ररूप विष्णु जी के लोक में पहुंचे और वहां जाकर संदेश दिया। भगवान विष्णु ने शिवलोक का समाचार पूछा, तो दूत ने भगवान शिव की सारी बातें कह सुनाईं। अंतत: श्रीहरि विष्णु शिवजी का प्रस्ताव मानकर अश्व बनने को राज़ी हो गए। उन्होंने अश्व रूप धारण किया और पहुंच गए यमुना और तमसा के संगम पर, जहां लक्ष्मी जी अश्वी रूप में तपस्या में लीन थीं। विष्णु जी को अश्वरूप में आया देखकर अश्वी रूप धारी लक्ष्मी जी प्रसन्न हो उठीं।
अश्व-अश्वी रूप में श्रीहरि विष्णु व लक्ष्मी जी वहां रमण करने लगे। कुछ समय बाद अश्वी के गर्भ से एक सुंदर बालक ने जन्म लिया। पुत्र जन्म के बाद लक्ष्मी जी वैकुंठलोक में श्रीहरि विष्णु के पास लौट गईं।
लक्ष्मी जी के लौट जाने के बाद बालक के पालन-पोषण की जिम्मेदारी ययाति के पुत्र तुर्वसु ने ली। तुर्वसु संतानहीन थे और संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे। श्रीहरि विष्णु-लक्ष्मी का पुत्र पाकर तुर्वसु प्रसन्न हो उठे। उन्होंने इस बालक का नाम ‘हैहय’ रखा। कालातंर में इस हैहय के वंशज हैहयवंशी कहलाए।
प्रस्तुति- डा. जवाहर धीर

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

रोज रोज हटवा के बाजे ला कंगनवा॥
कोठवा पे कोयल बोले मोरवा अंगनवा॥
बदरवा रिम झिम बरषे॥
तितली का उड़त देख उडयलाग मनवा॥
जुगनू के चम चम से इथे ल बदनवा॥
बदरवा रिम झिम बरषे॥
पोर पोर टपके ल चढ़ती जवानी॥
अंखिया बतावे लागी प्रेम कई कहानी॥
लच्कल कमरिया से उठे ल घंघरवा
बदरवा रिम झिम बरषे॥
फूक फूक गोड़ धरी बहुत शरमाई॥
mनवा के पीर अपने केह्से बतायी॥
जोबना के जोर से हटे ला आचार्वा॥
बदरवा रिम झिम बरषे॥

रविवार, 16 अगस्त 2009

गौरैया नही दिखाई है॥

छोटी चिडिया आँगन में आकर॥

चावल के किनके चुगती थी॥

चारो तरफ़ फुदक फुदक के॥

ची ची ची ची करती ही॥

उस समय आँगन में मेरे ॥

अद्भुत शोभा होती थी॥

पता नही क्या कारन है अब॥

शायद चावल में नही मिठाई है॥

कई महीने बीत गए ॥

गौरैया नही दिखाई है॥

बुधवार, 29 जुलाई 2009

अपने सपनों की चाहत पूरी करने के लिए..निकल पड़े हैराह मिल गई है..रास्ता कठिन हैयहाँ वीरान जंगल नही है..नदिया नही हैउबड़ - खाबड़ नही हैदल दल नही फ़िर भी जिंदगी मौत बन गई हैयहाँ पर तो लोगो को मरते देख कर के रूह काँप जाती हैआत्मा रोने लगाती हैयहाँ के लोग भी ऊँट पतंग हैसभ्यता उनके रगरग में बाशी हैअभी आप रास्ता पुँछ लो की हमें फला जगह जाना हैतुंरत बोलेगे..भाई साहब आप इस रास्ते से जा सकते हैलेकिन रास्ता ग़लत होगारास्ते पर चलते समय आप को ध्यान देना होगाकी जिंदगी कही मौत बन जाए कही

सोमवार, 20 जुलाई 2009

हमने तो तुम्हे अपना बना लिया

तुम हमें पराया समझती रही

तुम्हारी डगर में मैंने फूल बोया

पता नही क्यो काटो में उलझती रही


तुम जहा भी रहो खुसी से आँगन हरा कर दो

जब हम जहा में रहे तब भी तुम थोदा रहम कर दो

सच के बीज जो बोते..है..

हैरानी के बीज जो बोओगे॥

तो धरती बंजर हो जायेगी॥

सूख जायेगे झरने नैया॥

मरने की नौबत आ जायेगी॥

हवा न देगी ढंडक उनको॥

मौसम न उन्हें नहलाएगा॥

सच्चाई की थाप पड़ेगी॥

हस हस गगन रुलाएगा॥

पाखंडी पापी चिल्लायेगे॥

काल की कुर्की जब आएगी॥

अत्याचारी की मधाही जो है॥

सच्चाई उन्हें धहाएगी॥

उनके संतापों की अन्तिम लीला

हाय हाय करते जायेगी...

रविवार, 19 जुलाई 2009


उनकी काली करतूतों को हम सुंदर अक्षरो के साथ सादे कागज़ पर उतारा करे...गे


इनता ही नही शुरीली आवाज़ से श्रोताओ के कानो तक उनकी बुरइयो की भनक हम पहुचाया करेगे...


लेखनी रुक नही सकतीचाहे तुम जीतनी जातां कर लो



शनिवार, 18 जुलाई 2009

बादल की बरात..

आज बादल बरात है लाया॥

उमड़ घुमड़ कर धरती पर॥

आतिश बाजी हो रही है ॥

दुल्हन के ड्योढी पर॥

हरियाली दुल्हन बन बैठी॥

कलियाँ उसे सजा रही है॥

कीट पतंगे नाच दिखाते॥

वर्षा माँ मुस्का रही है॥

देव लोक से पुष्प बरसते ॥

दुल्हन देल्हे की भावरी पर॥

अनमोल रतन

मेरे पास दो अनमोल रतन है॥

एक मै ख़ुद

दुसरा मेरा विशवास ॥

तीसरा आना चाहता है॥

लेकिन मै उसे आने नही देता॥

वह अहंकार है॥ उसके आते ही हमारे दोनों रत्नों का विनाश हो जाएगा॥

रविवार, 29 मार्च 2009


priy अभिभावक जन सादर नमस्कार ,,


priy अभिभावक जन सादर नमस्कार ,,

सरकार को पता है, लेकिन वह तो तमाशा देखती है,

हमें कभी कभी आश्चर्य होता है, की सरकार सब जानती है, ओउर आम लोगो को भी पता है, की यहाँ ग़लत काम भी होता होगा। क्यो की कई बार बातें सामने आती है, लेकिन किसी को कोई लेना देना नही होता, मैंने गौर से देखा तो हमें गलानी हुयी ,,मई आप को बता देता हूँ की जैसे जितने अनाथ्याला ,आश्रम ,मैथ कई जगह मैंने देखा की कभी काफी आराजक तत्व रहते है, ओउर लोगो को हनी पहुचाते है, एक आश्रम से एक १७ की लार्की से बात किया तो वह कर रही की मई प्रभु की शरण में हूँ, बहुत बुरा लगा हमें ,१० साल के लार्के का यही हाल था, हमारे सरकार को चाहिए जितने धर्म में नाम पर आश्रम मैथ मदर्षा है, सब पर छापा परे, तो देखो वह से क्या क्या बरामद होता.मेरा तो ख्याल काफी इन्शान ऐसे मिलेगे जिनके बीबी बच्चे माता पिटा यही सोच रहे होगे, शायद मर गया होगा। ओउर कितने गांजा,भांग ओउर भी नशीले पदार्थ मिल सकते है, जैसे एक जगह का मई नाम बता रहा हूँ, मनीराम छावनी अयोध्या। ओउर हर एक तीरथ धाम में कितने मैथ है, जो धर्म के नाम पर कमाई का जरिया बना रखे, है,

गुरुवार, 26 मार्च 2009

वक्त बताये गा क्या होगा//

प्यार के धोखे कैसे दस्ते है

शायद तुमको मालूम होगा//

नींद तो मेरी टूट गयी है,

तेरी नींद का क्या होगा॥

साथ होता तो थपकी देता

सीने पर दिल रख सो जाती

कुछ पल तो मई भी खुश रहता

ये वक्त बताये गा क्या होगा॥

मेरी हँसी तो रूठ गयी है

तेरी हँसी का क्या होगा॥

साथ होता तो खुश कर देता

मेरी बातो पर हस देती

उसी पालो में मन खो जाता

ये वक्त बताये गा क्या होगा//

मेरा दिल तो दूर चला गया

तेरे दिल का क्या होगा

पास होता तो थाम लेता

गद गद हो जाता ललचाया जिया

खुशी के मोटी मई चुग लेता

ये वक्त बायेगा क्या होगा//

आंधी तो मुझको ठेल दिया है

तेरे सहारे का क्या होगा

पास होता तो वाहो में जाकर कर

मन की बातें कह देता ,,

कब झरने से आंसू बंद होगे,

ये वक्त बताये गा क्या होगा//

बुधवार, 25 मार्च 2009

दक्ष प्रजापति

दक्ष प्रजापति को अन्य प्रजापतियों के समान ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र के रूप में रचा था। दक्ष प्रजापति का विवाह स्वयंभुव मनु की तृतीय कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। दक्ष प्रजापति की पत्नी प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि का साथ, सुधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ, और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, द्वी और मूर्ति।
दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता उस यज्ञ बिना बुलाये ही चली गईं। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान शंकर ने वीरभद्र के द्वारा उस यज्ञ का विध्वंश करा दिया। वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी की प्रार्थना करने पर भगवान शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।