रविवार, 29 मार्च 2009


priy अभिभावक जन सादर नमस्कार ,,


priy अभिभावक जन सादर नमस्कार ,,

सरकार को पता है, लेकिन वह तो तमाशा देखती है,

हमें कभी कभी आश्चर्य होता है, की सरकार सब जानती है, ओउर आम लोगो को भी पता है, की यहाँ ग़लत काम भी होता होगा। क्यो की कई बार बातें सामने आती है, लेकिन किसी को कोई लेना देना नही होता, मैंने गौर से देखा तो हमें गलानी हुयी ,,मई आप को बता देता हूँ की जैसे जितने अनाथ्याला ,आश्रम ,मैथ कई जगह मैंने देखा की कभी काफी आराजक तत्व रहते है, ओउर लोगो को हनी पहुचाते है, एक आश्रम से एक १७ की लार्की से बात किया तो वह कर रही की मई प्रभु की शरण में हूँ, बहुत बुरा लगा हमें ,१० साल के लार्के का यही हाल था, हमारे सरकार को चाहिए जितने धर्म में नाम पर आश्रम मैथ मदर्षा है, सब पर छापा परे, तो देखो वह से क्या क्या बरामद होता.मेरा तो ख्याल काफी इन्शान ऐसे मिलेगे जिनके बीबी बच्चे माता पिटा यही सोच रहे होगे, शायद मर गया होगा। ओउर कितने गांजा,भांग ओउर भी नशीले पदार्थ मिल सकते है, जैसे एक जगह का मई नाम बता रहा हूँ, मनीराम छावनी अयोध्या। ओउर हर एक तीरथ धाम में कितने मैथ है, जो धर्म के नाम पर कमाई का जरिया बना रखे, है,

गुरुवार, 26 मार्च 2009

वक्त बताये गा क्या होगा//

प्यार के धोखे कैसे दस्ते है

शायद तुमको मालूम होगा//

नींद तो मेरी टूट गयी है,

तेरी नींद का क्या होगा॥

साथ होता तो थपकी देता

सीने पर दिल रख सो जाती

कुछ पल तो मई भी खुश रहता

ये वक्त बताये गा क्या होगा॥

मेरी हँसी तो रूठ गयी है

तेरी हँसी का क्या होगा॥

साथ होता तो खुश कर देता

मेरी बातो पर हस देती

उसी पालो में मन खो जाता

ये वक्त बताये गा क्या होगा//

मेरा दिल तो दूर चला गया

तेरे दिल का क्या होगा

पास होता तो थाम लेता

गद गद हो जाता ललचाया जिया

खुशी के मोटी मई चुग लेता

ये वक्त बायेगा क्या होगा//

आंधी तो मुझको ठेल दिया है

तेरे सहारे का क्या होगा

पास होता तो वाहो में जाकर कर

मन की बातें कह देता ,,

कब झरने से आंसू बंद होगे,

ये वक्त बताये गा क्या होगा//

बुधवार, 25 मार्च 2009

दक्ष प्रजापति

दक्ष प्रजापति को अन्य प्रजापतियों के समान ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र के रूप में रचा था। दक्ष प्रजापति का विवाह स्वयंभुव मनु की तृतीय कन्या प्रसूति के साथ हुआ था। दक्ष प्रजापति की पत्नी प्रसूति ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का अग्नि का साथ, सुधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, सती नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ, और शेष तेरह कन्याओं का धर्म के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, द्वी और मूर्ति।
दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान शंकर और अपनी पुत्री सती को निमन्त्रित नहीं किया। शंकर जी के समझाने के बाद भी सती अपने पिता उस यज्ञ बिना बुलाये ही चली गईं। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने सती और शंकर जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण सती ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। सती की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान शंकर ने वीरभद्र के द्वारा उस यज्ञ का विध्वंश करा दिया। वीरभद्र ने दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में ब्रह्मा जी की प्रार्थना करने पर भगवान शंकर ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।