बुधवार, 29 जुलाई 2009

अपने सपनों की चाहत पूरी करने के लिए..निकल पड़े हैराह मिल गई है..रास्ता कठिन हैयहाँ वीरान जंगल नही है..नदिया नही हैउबड़ - खाबड़ नही हैदल दल नही फ़िर भी जिंदगी मौत बन गई हैयहाँ पर तो लोगो को मरते देख कर के रूह काँप जाती हैआत्मा रोने लगाती हैयहाँ के लोग भी ऊँट पतंग हैसभ्यता उनके रगरग में बाशी हैअभी आप रास्ता पुँछ लो की हमें फला जगह जाना हैतुंरत बोलेगे..भाई साहब आप इस रास्ते से जा सकते हैलेकिन रास्ता ग़लत होगारास्ते पर चलते समय आप को ध्यान देना होगाकी जिंदगी कही मौत बन जाए कही

सोमवार, 20 जुलाई 2009

हमने तो तुम्हे अपना बना लिया

तुम हमें पराया समझती रही

तुम्हारी डगर में मैंने फूल बोया

पता नही क्यो काटो में उलझती रही


तुम जहा भी रहो खुसी से आँगन हरा कर दो

जब हम जहा में रहे तब भी तुम थोदा रहम कर दो

सच के बीज जो बोते..है..

हैरानी के बीज जो बोओगे॥

तो धरती बंजर हो जायेगी॥

सूख जायेगे झरने नैया॥

मरने की नौबत आ जायेगी॥

हवा न देगी ढंडक उनको॥

मौसम न उन्हें नहलाएगा॥

सच्चाई की थाप पड़ेगी॥

हस हस गगन रुलाएगा॥

पाखंडी पापी चिल्लायेगे॥

काल की कुर्की जब आएगी॥

अत्याचारी की मधाही जो है॥

सच्चाई उन्हें धहाएगी॥

उनके संतापों की अन्तिम लीला

हाय हाय करते जायेगी...

रविवार, 19 जुलाई 2009


उनकी काली करतूतों को हम सुंदर अक्षरो के साथ सादे कागज़ पर उतारा करे...गे


इनता ही नही शुरीली आवाज़ से श्रोताओ के कानो तक उनकी बुरइयो की भनक हम पहुचाया करेगे...


लेखनी रुक नही सकतीचाहे तुम जीतनी जातां कर लो



शनिवार, 18 जुलाई 2009

बादल की बरात..

आज बादल बरात है लाया॥

उमड़ घुमड़ कर धरती पर॥

आतिश बाजी हो रही है ॥

दुल्हन के ड्योढी पर॥

हरियाली दुल्हन बन बैठी॥

कलियाँ उसे सजा रही है॥

कीट पतंगे नाच दिखाते॥

वर्षा माँ मुस्का रही है॥

देव लोक से पुष्प बरसते ॥

दुल्हन देल्हे की भावरी पर॥

अनमोल रतन

मेरे पास दो अनमोल रतन है॥

एक मै ख़ुद

दुसरा मेरा विशवास ॥

तीसरा आना चाहता है॥

लेकिन मै उसे आने नही देता॥

वह अहंकार है॥ उसके आते ही हमारे दोनों रत्नों का विनाश हो जाएगा॥