बुधवार, 29 जुलाई 2009

अपने सपनों की चाहत पूरी करने के लिए..निकल पड़े हैराह मिल गई है..रास्ता कठिन हैयहाँ वीरान जंगल नही है..नदिया नही हैउबड़ - खाबड़ नही हैदल दल नही फ़िर भी जिंदगी मौत बन गई हैयहाँ पर तो लोगो को मरते देख कर के रूह काँप जाती हैआत्मा रोने लगाती हैयहाँ के लोग भी ऊँट पतंग हैसभ्यता उनके रगरग में बाशी हैअभी आप रास्ता पुँछ लो की हमें फला जगह जाना हैतुंरत बोलेगे..भाई साहब आप इस रास्ते से जा सकते हैलेकिन रास्ता ग़लत होगारास्ते पर चलते समय आप को ध्यान देना होगाकी जिंदगी कही मौत बन जाए कही

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