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dharmik bate
सोमवार, 20 जुलाई 2009
हमने
तो
तुम्हे
अपना
बना
लिया
॥
तुम
हमें
पराया
समझती
रही
॥
तुम्हारी
डगर
में
मैंने
फूल
बोया
॥
पता
नही
क्यो
काटो
में
उलझती
रही
॥
तुम
जहा
भी
रहो
खुसी
से
आँगन
हरा
कर
दो
॥
जब
हम
जहा
में
न
रहे
तब
भी
तुम
थोदा
रहम
कर
दो
॥
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अपने सपनों की चाहत पूरी करने के लिए..निकल पड़े है॥ ...
हमने तो तुम्हे अपना बना लिया॥ तुम हमें पराया समझती...
सच के बीज जो बोते..है..
उनकी काली करतूतों को हम सुंदर अक्षरो के साथ सादे ...
बादल की बरात..
अनमोल रतन
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